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लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिसका भविष्य सबसे लंबा है, उसकी आवाज़ अक्सर सबसे कम सुनी जाती है।भारत को दुनिया का सबसे युवा लोकतंत्र कहा जाता है। देश की बड़ी आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। कॉलेजों, स्टार्टअप्स, खेतों, फैक्ट्रियों और डिजिटल दुनिया में युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। लेकिन जब बात नीति बनाने और कानून बनाने की आती है, तो युवाओं का प्रतिनिधित्व उतना दिखाई नहीं देता।यह सवाल किसी पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी के खिलाफ खड़ा करने का नहीं है। अनुभव किसी भी लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन ऊर्जा, नए विचार और बदलते समय की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। एक स्वस्थ लोकतंत्र तब बनता है जब अनुभव और नवाचार साथ चलें।राजनीति में युवाओं की आवश्यकता क्यों है?क्योंकि आज के युवा जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं—रोज़गार, शिक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य—उनके समाधान के लिए नई सोच की आवश्यकता है। निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उन लोगों की भी पर्याप्त भागीदारी होनी चाहिए जो इन चुनौतियों को प्रत्यक्ष रूप से जी रहे हैं।कुछ तथ्यभारत में लोकसभा की 543 निर्वाचित सीटें हैं।उपलब्ध आयु-आधारित आँकड़ों के अनुसार, 40 वर्ष या उससे कम आयु के लोकसभा सांसद लगभग 10% हैं। आँकड़े यह नहीं कहते कि वर्तमान व्यवस्था गलत है, बल्कि यह संकेत देते हैं कि युवा प्रतिनिधित्व पर चर्चा की गुंजाइश मौजूद है।क्या समाधान आरक्षण है?ज़रूरी नहीं।लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के कई रास्ते हो सकते हैं—राजनीतिक दलों द्वारा अधिक युवा उम्मीदवारों को अवसर देना, नेतृत्व प्रशिक्षण, स्थानीय निकायों से नेतृत्व विकसित करना और पहली बार चुनाव लड़ने वालों के लिए बेहतर संस्थागत समर्थन।मुद्दा केवल उम्र का नहीं, अवसर का है।अंतिम विचारएक राष्ट्र का भविष्य केवल उसके संसाधनों से नहीं, बल्कि उसके नेतृत्व की विविधता से तय होता है। यदि संसद और विधानसभाओं में अनुभव के साथ-साथ युवाओं की आवाज़ भी संतुलित रूप से सुनाई दे, तो लोकतंत्र और अधिक जीवंत बन सकता है।युवा सिर्फ़ देश का भविष्य नहीं हैं। वे वर्तमान के भी सहभागी हैं।”लोकतंत्र तब परिपक्व होता है, जब हर पीढ़ी को केवल वोट देने का नहीं, बल्कि नेतृत्व करने का भी समान अवसर मिले।”— Republic Lens